उसकी माँ / Usaki Maa | भाग– दूसरा : एक अधूरी प्रेम कहानी | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
अभी तक आपने पढ़ा ...….
दादी केतकी जब निधि को स्कूल से लेकर घर आ रही थी तो रास्ते में एक इंसान को देखकर घबरा जाती है और दूसरे रास्ते से घर आती है। निधि के लाख पूछने पर जब दादी यह बताती है कि वो तुम्हारे पिता थे तो सुनकर उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाती है।
अब आगे क्या होता है पढ़िए इस दूसरे भाग में ......
💔 एक अधूरी प्रेम कहानी
( भाग- दूसरा )
✍️ कुमार सरोज
कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा था।दीवार पर टंगी सौम्या की मुस्कुराती तस्वीर मानो वर्षों बाद अपनी बेटी से मिलने की प्रतीक्षा कर रही थी। निधि की आँखें उसी तस्वीर पर टिक गईं।
"दादी...। " उसकी आवाज़ भर्रा गई। "माँ कैसी थीं?"
केतकी ने तस्वीर की ओर देखा। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन आँखें फिर भी भीग गईं।
"अगर भगवान किसी इंसान को सुंदर दिल देना भूल जाएँ, तो शायद वह सौम्या जैसी बेटी को धरती पर भेजते ही नहीं।"
कुछ क्षण तक वह अतीत में खोई रही।
फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
"यह कहानी आज से लगभग तेरह साल पहले की है..। "
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उत्तर प्रदेश का जौनपुर शहर। पुरानी हवेली, बड़ा-सा आँगन, तुलसी चौरा और सुबह-शाम शंख की आवाज़। यहीं जन्मी थी सौम्या त्रिपाठी।
घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। पिता शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी थे और माँ धार्मिक तथा संस्कारी महिला। सौम्या इकलौती संतान थी। बचपन से ही पढ़ाई में तेज़, स्वभाव से शांत और आत्मसम्मान उसकी सबसे बड़ी पूँजी था। पैसों का घमंड उसे कभी छू भी नहीं पाया। उसे किताबों से उतना ही प्रेम था, जितना लोगों से।
एम.ए. की पढ़ाई के लिए उसका दाख़िला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हुआ। वहीं उसकी मुलाक़ात हुई... राज से।
राज आर्थिक रूप से साधारण परिवार का लड़का था। पढ़ने में अच्छा था, बातों में तेज़ और सपने बहुत बड़े देखता था।
दोनों की पहली मुलाक़ात लाइब्रेरी में हुई। राज ने गलती से सौम्या की किताब उठा ली थी।
"माफ़ कीजिए... शायद यह आपकी किताब है।"
सौम्या मुस्कराकर बोली—
"कोई बात नहीं। किताबें जितनी पढ़ी जाएँ, उतना अच्छा।"
बस... यहीं से बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए।
दोस्ती कब प्रेम में बदल गई, दोनों को पता ही नहीं चला।
"क्या नाना-नानी को यह रिश्ता पसंद था?" निधि ने बीच में पूछा।
केतकी ने सिर हिलाया।
"नहीं बेटा।"
"वे चाहते थे कि सौम्या की शादी किसी बड़े और संपन्न परिवार में हो।"
"लेकिन माँ ने...। ?"
"उन्होंने साफ़ कह दिया—'मैं शादी पैसे से नहीं, इंसान से करूँगी।'"
निधि की आँखों में चमक आ गई।
"बिल्कुल मेरी माँ जैसी बात।"
केतकी मुस्करा दी।
"हाँ... वह अपने फैसले खुद लेने का साहस रखती थी।"
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परिवार के विरोध के बावजूद दोनों ने विवाह कर लिया। उस दिन सौम्या ने अपने माता-पिता के चरण छूकर केवल इतना कहा था—
"अगर कभी लगे कि आपकी बेटी गलत थी, तो मुझे भूल जाइएगा। लेकिन अगर कभी लगे कि मैं सही थी, तो एक बार मुझे बेटी कहकर ज़रूर बुलाइएगा।"
उसके पिता ने मुँह फेर लिया।
माँ रोती रह गईं।
और सौम्या...
अपनी आँखों के आँसू पोंछकर राज का हाथ थामे नई ज़िंदगी की ओर चल पड़ी।
शादी के शुरुआती महीने किसी सपने जैसे थे। किराए का छोटा-सा घर। पुराना पंखा। टूटी हुई कुर्सी। लेकिन दोनों के पास उम्मीदों का बहुत बड़ा संसार था।
सौम्या हर सुबह चाय बनाते हुए कहती—
"देखना राज... एक दिन हम अपना घर बनाएँगे।"
राज हँस देता—
"और उस घर की बालकनी में तुम्हारी पसंद के गुलाब लगाऊँगा।"
दोनों हँस पड़ते। गरीबी थी... लेकिन प्यार भी था।
एम.ए. पूरा होने के बाद नौकरी की तलाश शुरू हुई। राज रोज़ इंटरव्यू देता। हर शाम मायूस लौट आता।
धीरे-धीरे उसके चेहरे की मुस्कान कम होने लगी।
एक दिन उसने झुंझलाकर कहा—
"लगता है डिग्री सिर्फ़ दीवार पर टाँगने के लिए मिली है।"
सौम्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"हार मानने वाले तुम नहीं हो।"
राज चुप रहा।
कुछ दिन बाद सौम्या ने कहा—
"जब तक तुम्हें नौकरी नहीं मिलती, मैं काम कर लेती हूँ।"
राज तुरंत तमतमा उठा।
"मेरी पत्नी नौकरी करेगी और मैं घर बैठा रहूँ?"
"यह बात नहीं है राज।"
"तो क्या बात है?"
"घर हम दोनों का है। जिम्मेदारी भी दोनों की है।"
राज का पुरुष-अहंकार पहली बार सामने आया।
"मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"
सौम्या ने बहुत शांत स्वर में कहा—
"मुझे भी अच्छा नहीं लगता कि रोज़ तुम्हें निराश लौटते देखूँ।"
कमरे में खामोशी छा गई।
उस रात दोनों ने साथ खाना तो खाया, लेकिन पहली बार बिना मुस्कुराए।
कुछ दिनों बाद सौम्या को एक बड़ी निजी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई। वेतन अच्छा था। घर का खर्च चलने लगा।
राज ने ऊपर से मुस्कराकर बधाई दी, लेकिन भीतर कहीं उसका अहंकार धीरे-धीरे टूटने लगा था।
सौम्या ने कभी इस बदलाव पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगता था— पति-पत्नी का रिश्ता जीत और हार का नहीं, साथ निभाने का होता है। लेकिन उसे कहाँ पता था कि किस्मत उसके धैर्य की सबसे कठिन परीक्षा लेने वाली है।
उस कंपनी की चमचमाती इमारत के भीतर कोई ऐसा भी था, जो उसकी मेहनत नहीं, उसकी मजबूरी को देख रहा था। और उसी दिन एक अनहोनी की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी।
केतकी यहीं चुप हो गई।
निधि बेचैनी से बोली—
"दादी..। फिर क्या हुआ?"
केतकी ने भारी साँस ली। उसकी आँखें फिर नम हो गईं।
"बेटी..। कुछ कहानियों का सबसे दर्दनाक अध्याय वहीं से शुरू होता है, जहाँ इंसान सोचता है कि अब उसकी ज़िंदगी पटरी पर आ गई है।"
क्रमशः आगे ...
📖💌📖 उसकी मां कहानी का पहला भाग यदि आपने अभी तक नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। प्रेम, परिवार और संघर्ष की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानी है।
पीछे के भाग को पढ़ने के लिए नीचे लिखे कहानी के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -
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